Jyoti Mishra
1 min readSep 4, 2019

~

एक सीमा देखि
लिखा हुआ था की, “समझ जाओ इससे आगे चलना मना है”
पर लग रहा था उस पार कोई अपना सा है,
पर बस लग ही रहा था,
यह भी पता था
सच तो सीमा के आर और पार एक ही था, एक ही होता है।

दो लिखे हुए खत,
उस पार भेज सकते हैं क्या?
“नहीं, इससे आगे भेजना मना है, समझ जाओ”
थोड़ा देर रुक सकते हैं?

पहले खुद को ढून्ढ लो
अभी यहाँ रुकना मना है

कब रुक सकते हैं?
कभी नहीं, ये समझ जाओ।

(this part is written after I had an accident)

बातें सच नहीं होती
ना ही कुछ महसूस करना
वो बोल रहे थे
सुनकर मानी नहीं, पर कुछ कहना नहीं था।

जो सारे छूट रहे थे, सपने? वादें? साथ? वो जा चुके थे
झूठ और सच के परे हो गए थे,
समझ की एक चारा मेरे हाथ में थी
सीमा के इस पार, जहाँ मैं थी,
थोड़ी समझ वही बो दि,
पता है एक दिन उससे फूल खिलेंगे
चश्मा पहने क देखो तो शायद गुलाबी नहीं,
वैसे ही दिखेंगे जैसे हैं।

एक उड़ता हुआ पंछी
जितना सुन्दर था
उतना ही सुन्दर था ठहरना भी,
अब बस वही था, जो है|

शुन्य था या एक अपना सा ठहराव
अब बस वही था, जो है।

अब चलते हैं…

Jyoti Mishra
Jyoti Mishra

Written by Jyoti Mishra

My thoughts and reflections are habitually my best companions.

No responses yet